खून

आज मेरे हाथों एक खून हुआ है

आखीर मैंने भी अब तक सहन कीया …
हर बार… हर बार…
मेरा ही गला घोटने की कोशिश की है
मेरे सपनों ने…

एक उम्मीद का सहारा ले कुछ कदम चलती
ठोकर मार साली अपना रुख ही बदल लेती
गालीयाँ मैंने भी सही है
मुझ पर व्यंग कर ठहाके मार हँसी है
मेरी हर उम्मीद…

नाजो से पला हर आंस को
अभी जाने एक मासूम की तरह
जैसे चार शब्द दुनीयादारी के सीखे
लात मर हरामजादी गालीयाँ दे नीकली
कमीनी हर आंस

एक सपने को आज बस
धरा ही था अपने कोक मी
हीम्मत नही अब अपने पैदाइश से
दोबारा जलील होने का

आज मेरे हाथों एक खून हुआ है
मेरे सपनों का…

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One thought on “खून

  1. achchha likhti hai aap…magar aur bhi asimit gunjaishe hain aap me…jo dheere dheere parwan chadengi…khirama khirama..bahar-haal likhte rahiye…yaani chhilte rahiye apne aap ko…thoda bahut khoon niklega…magar kbhi kabhi amrit bhi..amrita jo thahari aap..

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